इकोनॉमी व इकोलॉजी की तरफ बढ़ता भारत
दुनिया में अगर कहीं भारत की संतुलन और बदलते हुए पर्यावरण संकट का समाधान मिल सकता है, तो वह भारत ही हो सकता है। यह बात अलग है कि जब दुनिया में आर्थिक संकट आया और सभी देशों के सामने बेरोजगारी, विकास और जीवनशैली सुधारने जैसी बड़ी चुनौतियाँ थीं, तब पश्चिमी देशों की भूमिका अहम रही। यह भी स्पष्ट है कि 1600 से पहले दुनिया में सबसे समृद्ध वे देश माने जाते थे, जिनके पास अपार प्राकृतिक संपदाएँ थीं।
यह आश्चर्य की बात है कि उस समय अमेरिका, जो आज एक विकसित देश है, दुनिया की अर्थव्यवस्था में मात्र 5% योगदान करता था। उस समय सबसे अधिक समृद्ध देश एशिया और अफ्रीका से जुड़े थे, और दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था में इन क्षेत्रों की भागीदारी 70% से अधिक थी। लेकिन 1600 के बाद विज्ञान की क्रांति ने यूरोप को सबसे बड़ा लाभ पहुँचाया। यद्यपि वहाँ कई तरह की सीमाएँ थीं, फिर भी विज्ञान ने इन देशों की आर्थिकी को पूरी तरह बदल दिया।
आज के हालात देखें तो यूरोप, अमेरिका, इंग्लैंड जैसे देश दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्था में शामिल हैं, जबकि अफ्रीका और एशिया के अधिकांश देश निम्न अर्थव्यवस्था में गिने जाते हैं। हालांकि, पिछले तीन दशकों में भारत और चीन ने आर्थिक प्रगति में बड़ी छलाँग लगाई है और खुद को वैश्विक स्तर पर अग्रणी साबित किया है।
लेकिन इस आर्थिक दौड़ का सबसे बड़ा नुकसान पारिस्थितिक असंतुलन के रूप में सामने आया। पिछले 200-300 वर्षों में सबसे बड़ा बोझ प्रकृति पर पड़ा है। खासकर वे देश, जो आज सबसे आगे हैं, उन्होंने प्रकृति का अत्यधिक दोहन किया। आने वाले समय में अमीर देशों द्वारा प्रकृति पर दबाव कई गुना बढ़ने की संभावना है। अगर आज सही निर्णय नहीं लिए गए, तो यह संकट और गहरा होगा।
इकोनॉमिक क्राइसिस में विज्ञान ने समाधान दिया, लेकिन इकोलॉजिकल क्राइसिस में विज्ञान चमत्कार नहीं कर सकता। इस समस्या का समाधान केवल पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के संतुलित उपयोग में ही है। भारत इस दिशा में विशेष रूप से सक्षम है, क्योंकि हमारी संस्कृति और परंपराएँ प्रकृति के प्रति गहरे सम्मान से जुड़ी हैं। हमारी प्राचीन ग्रंथों से लेकर जीवनशैली तक हर जगह हवा, मिट्टी, जंगल और पानी का सम्मान करने की परंपरा रही है। अब इसे ऐसे देखिए आज भी भारत कृषि को अपनी आर्थिकी का बड़ा अंग मानता हे और 10 प्रतिशत से ज्यादा जीडीपी में इस क्षेत्र की भागीदारी हे जब कि अमेरिका, रुस ऑस्ट्रेलिया यूरोपीय देशों में ये 1 प्रतिशत से ज्यादा हे। इसका मतलब सरकार की प्रकृति के ऊपर निर्भरता हे। और प्रधानमंत्री का नारा कृषि के उत्पादन को डबल करना अपने असर में हे।
भारत ने विकास की राह पर चलते हुए यह सुनिश्चित करने के लिए कई कदम उठाए हैं कि आर्थिक प्रगति पारिस्थितिक संकट का कारण न बने। ऊर्जा का अत्यधिक उपयोग और बढ़ते शहरीकरण के कारण चुनौतियाँ बढ़ रही हैं। अनुमान है कि 2050 तक ऊर्जा की खपत कई गुना बढ़ जाएगी। इस चुनौती को देखते हुए भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा पर ध्यान केंद्रित किया है। एक आंकड़े के अनुसार 2014 में भारत की सोलर क्षमता 2,82 GW थी जो 2024 में बढ़कर 85,5 GW हो गई। जुलाई 2025 में 107 GW हुई। अकेले 24=25 में इसने 144,15 TWH बिजली उत्पन्न की। मतलब सोलर क्षमता में पिछले एक दशक में 4000 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। दुनिया में हम आज तीसरे नंबर में हैं
वैकल्पिक ऊर्जा में में हमने 47 प्रतिशत निर्भरता बनाई हे। इसी तरह न्यूक्लियर ऊर्जा,हरित हाइड्रोजन में 100 GW तक का लक्ष्य तय किया हे। हर घर की सोलर उत्पादन का क्षमता को भी एक योजना के तहत जोड़ने के प्रयत्न अपना असर दिखा रहें हैं ।इतना ही नहीं ऊर्जा खपत को कम करने के लिए AC संयंत्रों की सीमा तय की जा रही हे।
ये सब इसलिए ताकि परंपरागत कोयले की ऊर्जा पर निर्भरता कम हो। और इसी से भारत ने दुनियां ने अपनी पहल की ताल ठोकी हे। अंतर्राष्ट्रीय बैठकों में सभी छोटे और विकासशील देशों के बीच नेतृत्व कर भारत लोहा मनवा रहा हे। देश के पर्यावरण मंत्री ने क्लाइमेट फण्ड को लेकर विश्व के बड़े देशों को शीशा तो दिखाया हे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 में सौर ऊर्जा को लेकर वैश्विक स्तर पर एक बड़ा आवाहन किया। इसका परिणाम यह है कि भारत ने 2030 तक अपनी कुल ऊर्जा खपत का 50% हिस्सा वैकल्पिक ऊर्जा से पूरा करने का लक्ष्य रखा है। आज चीन दुनिया में वैकल्पिक ऊर्जा में अग्रणी है, लेकिन भारत की तेजी से बढ़ती पहल के चलते भविष्य में स्थिति बदल सकती है।
भारत की आर्थिक नीतियों में संतुलन और समृद्धि की अवधारणा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसका उदाहरण स्वच्छ भारत अभियान है, जो गांधी से लेकर मोदी तक की सोच का हिस्सा रहा है। हालाँकि देश बड़ा है, इसलिए परिणाम तुरंत नहीं दिखते, लेकिन यह पहल लंबे समय में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बनेगी।
जल संकट एक वैश्विक समस्या है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने जल संरक्षण के लिए कई योजनाएँ शुरू की हैं, जिनमें “कॅच द रेन”, “अमृत सरोवर” और नदियों के पुनरुद्धार जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। यह सब हमारी पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों के अनुरूप है। पानी जोड़ना सरकार की पहल का बड़ा हिस्सा हे। देश दुनिया में अपनी वर्षा के लिए भी जाना जाता हे पर अब तक इसका मात्र 8 % संरक्षित होता था। आज इस ओर गंभीर प्रयत्न जारी हे। अगर ये 30% का लक्ष्य हासिल करले तो देश दुनिया में वॉटर सुरक्षित देश होगा।
वायु प्रदूषण नियंत्रण में शहरों को केंद्र में रखकर 100 शहरों के वायु उपचार की पहल हुई हे। वनों के विस्तार में वन कॉरिडोर जैसी योजनाओ की पहल देश के 33% क्षेत्र को वनाधारित बनाकर हम बड़ी पहल करेंगे। समृद्ध कृषि से जुड़ी पारिस्थितिकीय पहल भी भारत की रणनीति का हिस्सा हैं। यह स्पष्ट है कि भारत आर्थिक शक्ति बनने के साथ-साथ पारिस्थितिक संतुलन को भी प्राथमिकता दे रहा है।
किसी भी देश की आज के परिवेश में आर्थिक ओर परिस्थितिकी सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती है। प्रधानमंत्री मंत्री के इकोनॉमी ओर इकोलॉजी के नारे में पूरा दम है। ये ही देश दुनिया के लिए संपूर्ण मंत्र भी हे कि कैसे प्रकृति और विकास में संतुलन स्थापित किया जा सकता हे।
दुनियां को अगर कोई देश प्रकृति की बात समझा सकता हे वो भारत ही हो सकता हे। यहां क्या सरकार ओर क्या समाज सब के बीच इसकी स्वीकार्यता है। ओर इसी लिए हमारी आज की पारिस्थितिकी योजनाएं भरपाई ओर बेहतरी के लिए जुटी हैं जिसके परिणाम आने वाले समय विश्व भी स्वीकारेगा।