बारिश खुशी नहीं कुछ गम भी
इस बार मानसून के ठीक-ठाक रहने की आशा तो थी पर गर्मी नहीं पड़ेगी ऐसा नहीं सोचा था। पूरे देश में इस बार की गर्मी ने पूरी नरमी बरती। जो भी झेला वो गर्मी से ज्यादा उमश भरी ज्यादा थी। इस बार हमने गर्मी की लू को नहीं झेला,क्यों कि बीच बीच में बारिश ने गर्मी को तो थाम दिया पर उमस ज्यादा भर दी।
अब मानसून समय से पहले आकर अपनी उपस्थिति दर्ज कर चुका है। तथाकथित मानसून से पहले ही हमने देश के विभिन्न हिस्सों में स्थानीय बारिश देखी, जिसे इस रूप में परिभाषित किया जा सकता है कि पूरा सिस्टम—प्रकृति का और मौसम के व्यवहार का—कहीं न कहीं कुछ लड़खड़ा गया है।
हमारे लिए यह एक बड़ी अच्छी खबर होगी कि मानसून समय से पहले दस्तक दे चुका है, और साथ में यह भी कि हमने वह चुभती गर्मी नहीं झेली, ना ही उतनी तेज़ी से। एसी और कूलर ने इस बार शोर नहीं मचाया, जैसा कि देशभर में गत वर्षों में गर्मीयों के दोरान रहा । इस बार भले ही भारत में गर्मी कम रही हो, पर दुनिया भर में मई की गर्मी ने वही भयावह हालात पैदा किए। अभी तक की जो खबरें दुनिया भर से आई हैं, उनके अनुसार हमने 2025 में पृथ्वी की सतही तापमान को 1850 और 1990 के औद्योगीकरण की तुलना में 1.4 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा दिया है।
इस तरह के शोध भी सामने आ चुके हैं कि सतही तापमान 15.79°C दर्ज किया गया, जो 1991 से 2020 की अवधि के औसत से 0.53°C ज्यादा रहा। हमारे देश ने भले ही इस बार वैसी गर्मी नहीं झेली, लेकिन बाकी दुनिया में यह वर्ष भी काफी गर्म रहा। और वैसे भी, यदि हम अपने देश के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो हमें गर्मी से राहत इसलिए भी मिली क्योंकि बारिश की बूँदें बार-बार तापमान को नियंत्रित कर रही थीं। इसे प्री-मानसून कहा जाए या नहीं, लेकिन इस बदलाव को कतई हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि इसके पीछे बार-बार सक्रिय होता पश्चिमी विक्षोभ और ला नीना जैसी वैश्विक घटनाएं ज़िम्मेदार हैं।
पश्चिमी हिमालय में पूरे महीने के दौरान इन विक्षोभों ने तापमान को नियंत्रण में रखा और कृपा यह भी रही कि जंगल की आग को लेकर ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। देश के कई हिस्सों में मई के दौरान सामान्य से 20 से 40 प्रतिशत अधिक वर्षा हुई और तापमान चार से छह डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता-घटता रहा, लेकिन औसतन करीब 35°C के आसपास रहा।
इस बदलाव को लेकर हमारे चेहरों पर भले ही चमक हो कि मानसून समय से पहले आया और उसने राहत दी, लेकिन इसमें किसी भी तरह से सुख के संकेत नहीं हैं। इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण यही है कि लगातार तपता हुआ समुद्र अब मौसम को गहराई से प्रभावित कर रहा है। पश्चिमी विक्षोभ या समय से पहले मानसून की दस्तक देने के पीछे समुद्र की गर्माहट एक प्रमुख भूमिका निभा रही है। हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी का सबसे बड़ा हिस्सा समुद्र है, और अगर पृथ्वी का तापमान किसी भी कारण से बढ़ रहा हो, तो उसकी पहली और सबसे बड़ी चोट समुद्र पर ही पड़ती है।
विशाल समुद्र का क्षेत्रफल पृथ्वी की भूमि से तीन गुना बड़ा है। , अगर तापमान लगातार बढ़ता रहे, तो यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को विचलित कर सकता है। जैसे इस बार गर्मी वैसी नहीं लगी और आने वाले समय में यदि यही हालात बने रहे, तो शीतकाल भी नहीं दिखेगा और वसंत भी अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाएगा। पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने में दो प्रमुख कारक होते हैं—पहाड़ और समुद्र—जो मिलकर जलवायु का नियंत्रण करते हैं। इन्हें ‘क्लाइमेटिक गवर्नर’ के रूप में देखा जा सकता है।
इन्हीं से तय होता है कि मानसून कब और कैसे आएगा, और हमारे अन्य मौसम किस प्रकार रहेंगे। हमारे देश में मानसून का सबसे बड़ा कारक अंटार्कटिका भी है, जिसके व्यवहार से मानसून की दिशा और गहराई बनती है। अब यदि अंटार्कटिका और समुद्र दोनों किसी न किसी रूप में असंतुलित हो रहे हैं, तो इससे जुड़े मौसमीय व्यवहार भी उसी तरह से बदल जाएंगे।
इस समय सबसे महत्वपूर्ण बात यही समझी जानी चाहिए कि देश में गर्मी का कम पड़ना मात्र एक सीमित घटना नहीं है, बल्कि इसका गहरा प्रभाव खेती-बाड़ी, फल पट्टी और खेतों में होने वाले सभी प्रकार के उत्पादन पर पड़ेगा, क्योंकि उनके लिए मौसम चक्र की एक बड़ी भूमिका होती है। आने वाले समय में लीची, आम, सेब, बेर, नाशपाती और संतरा—इन सभी में बदलाव दिखाई देंगे।
आज हम सुख की लालसा में केवल वर्तमान की चिंता कर रहे हैं, लेकिन आने वाले समय की गंभीरता को हम समझ ही नहीं पा रहे हैं। यह सब संकेत हैं, जो हमें बेहतरी के लिए चेतावनी दे रहे हैं। परंतु मनुष्य आज के सुख में इतना डूबा हुआ है कि उसे अपने चारों ओर होने वाले परिवर्तनों का कोई आभास नहीं है। उसकी दूरदर्शिता समाप्त हो चुकी है, प्राथमिकताएं बदल चुकी हैं। लेकिन हमें यह समझना होगा कि हमारी कोई भी प्राथमिकताएं हों, प्रकृति की अपनी प्राथमिकताएं होती हैं। और उसके सामने हमारा कोई भी तर्क, योजना या व्यवस्था टिक नहीं पाएगी।
प्रकृति कभी भी, किसी भी मौके पर हमें ध्वस्त कर सकती है। यदि हम इतिहास को खंगालें तो पता चलेगा कि इससे पहले भी दो बार दुनिया समाप्त हो चुकी है। तब भी प्रकृति ने ही यह किया था। लेकिन अब इस बार प्रक्रिया को गति मनुष्य ने दे दी है। मतलब इन बदलावों को सरलता से ना लें ये दुनियाँ का भविष्य चौपट कर देंगे।