डीडीडब्ल्यूएस ने 9वें जिला कलेक्टर पेयजल संवाद का आयोजन किया
पांच जिलों ने स्रोत स्थिरता, जन भागीदारी, महिला सशक्तिकरण और संचालन एवं रखरखाव संबंधी अपनी नवोन्मेषी प्रथाओं का प्रदर्शन किया
जल शक्ति मंत्रालय के पेयजल एवं स्वच्छता विभाग (डीडीडब्ल्यूएस) ने आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 9वें जिला कलेक्टर पेयजल संवाद का आयोजन किया। इस कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिकारी, जिला कलेक्टर/उपायुक्त और राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों के जल जीवन मिशन (जेजेएम) के मिशन निदेशकों ने भाग लिया। इस बैठक का उद्देश्य जल जीवन मिशन (जेजेएम) 2.0 के प्रभावी कार्यान्वयन को गति देना तथा विभिन्न जिलों की सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों का आदान-प्रदान करना था।
संवाद की अध्यक्षता डीडीडब्ल्यूएस के सचिव अशोक के.के. मीना ने की। इस अवसर पर राष्ट्रीय जल जीवन मिशन (एनजेजेएम) के अपर सचिव एवं मिशन निदेशक कमल किशोर सोआन सहित विभाग के वरिष्ठ अधिकारी भी संवाद में उपस्थित थे।
इस अवसर पर अपने संबोधन में डीडीडब्ल्यूएस के सचिव अशोक के.के. मीना ने इस बात पर बल दिया कि जेजेएम 2.0 का फोकस अब बुनियादी ढांचे के निर्माण से आगे बढ़कर विश्वसनीय सेवा वितरण, स्थिरता और ग्रामीण जल आपूर्ति प्रणालियों के सामुदायिक स्वामित्व को सुनिश्चित करने पर केंद्रित हो गया है। उन्होंने जिला प्रशासनों के लिए जेजेएम 2.0 के तीन प्रमुख प्राथमिकता वाले क्षेत्रों पर प्रकाश डाला :
i. नियमित जिला जल एवं स्वच्छता मिशन (डीडब्ल्यूएसएम) बैठकें: उन्होंने हर महीने डीडब्ल्यूएसएम बैठकें आयोजित करने और बैठकों के कार्यवृत्त को समर्पित डैशबोर्ड पर अपलोड करने के महत्व पर जोर दिया और कहा कि पेयजल योजनाओं, संचालन एवं रखरखाव तथा सेवा वितरण के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए जिला स्तर पर नियमित समीक्षा और निगरानी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि डीडब्ल्यूएसएम बैठकों के संचालन पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी और जिला प्रदर्शन आकलन में इसे शामिल किया जाएगा।
ii. जल सेवा आकलन: उन्होंने पेयजल सेवा वितरण की स्थिति का आकलन करने में वार्षिक जल सेवा आकलन प्रक्रिया के महत्व पर जोर दिया और जिलों से आग्रह किया कि वे आकलन प्रक्रिया से परिचित हों और सेवा वितरण में सुधार के लिए इसके निष्कर्षों का उपयोग करें।
iii. जल अर्पण समारोह: सामुदायिक स्वामित्व पर बल देते हुए उन्होंने जल अर्पण समारोहों के माध्यम से पूर्ण हो चुकी जल आपूर्ति योजनाओं को ग्राम पंचायतों को व्यवस्थित रूप से चालू करने और सौंपने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि 15-30 दिनों के सफल परीक्षण और कार्यान्वयन के बाद संपत्तियों को औपचारिक रूप से ग्राम पंचायतों को सौंप दिया जाना चाहिए, जिससे वे संचालन एवं रखरखाव की जिम्मेदारी संभाल सकें। उन्होंने जिलों को सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता का जश्न मनाने और स्थानीय स्वामित्व को मजबूत करने के लिए सांसदों, विधायकों, पंचायत प्रतिनिधियों और स्थानीय समुदायों सहित जन प्रतिनिधियों की भागीदारी के साथ जल अर्पण कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रोत्साहित किया।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि देश भर के जिलों द्वारा सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने से प्रदर्शन में सुधार की प्रेरणा मिलेगी और जल जीवन मिशन के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार के लिए स्थायी पेयजल सेवाओं को सुनिश्चित करने की दिशा में प्रगति में तेजी आएगी।
कमल किशोर सोआन, अपर सचिव और मिशन निदेशक (एनजेजेएम) ने अपने संबोधन में जिलों को नियमित डीडब्ल्यूएसएसएम बैठकें आयोजित करने और समय पर पोर्टल पर कार्यवाही अपलोड करने की सलाह दी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जल स्रोतों की स्थिरता एक प्रमुख प्राथमिकता बनी रहनी चाहिए और यह अध्ययन करना महत्वपूर्ण है कि सफल मॉडलों को कैसे मानकीकृत किया जा सकता है और विभिन्न क्षेत्रों में दोहराया जा सकता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भूजल स्तर को बनाए रखना ग्रामीण जल आपूर्ति योजनाओं की दीर्घकालिक कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने सुझाव दिया कि जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, सिंचाई, जल संसाधन और जल संचय से जल भागीदारी पहलों से जुड़े अधिकारियों को डीडब्ल्यूएसएम बैठकों में आमंत्रित किया जाना चाहिए। इससे समन्वय में सुधार होगा, चल रहे जल संरक्षण कार्यों की नियमित समीक्षा संभव होगी और स्थानीय जलस्तर की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने में सहायता मिलेगी।
उन्होंने ग्राम पंचायतों में स्वचालित वर्षामापी यंत्र लगाने के लिए कृषि विभाग के साथ बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर भी जोर दिया। इससे जिलों को स्थानीय वर्षा के पैटर्न का आकलन करने, भूजल की स्थिति को समझने और जलस्तर को बनाए रखने के लिए आवश्यक अतिरिक्त उपायों की पहचान करने में मदद मिलेगी।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि जल अर्पण को केवल प्रतीकात्मक हस्तांतरण गतिविधि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका वास्तविक उद्देश्य जन भागीदारी और सामुदायिक स्वामित्व सुनिश्चित करना है। उन्होंने सलाह दी कि ग्राम पंचायतों को योजनाएँ सौंपने से पहले 15 दिनों का परीक्षण पूरा किया जाना चाहिए और योजना से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी, जिसमें अनुमान, रेखाचित्र और अन्य विवरण शामिल हैं, समुदाय के साथ साझा की जानी चाहिए। उन्होंने जिला प्रशासनों से मासिक जल अर्पण कैलेंडर तैयार करने का आग्रह किया।
एनजेजेएम के अपर सचिव एवं मिशन निदेशक ने ग्रामीण जल आपूर्ति सेवा वितरण में सुधार के लिए वित्त आयोग के अनुदानों के समयबद्ध और प्रभावी उपयोग पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि बिना उपयोग किए गए 15वें वित्त आयोग के बंधे हुए अनुदानों का उपयोग 16वें वित्त आयोग के तहत दिए गए दिशा-निर्देशों के अनुरूप किया जाना चाहिए। उन्होंने आग्रह किया कि इन संसाधनों को जिला सुधार योजनाओं के माध्यम से निर्धारित प्राथमिकताओं से जोड़ा जाना चाहिए।
उन्होंने दोहराया कि प्रभावी निधि उपयोग, वित्त आयोग के दिशानिर्देशों का पालन और जिला सुधार योजनाओं के आधार पर सुधारात्मक कार्रवाई जमीनी स्तर की कमियों को दूर करने, सेवा वितरण को मजबूत करने और ग्रामीण जल आपूर्ति योजनाओं के स्थायी संचालन और रखरखाव को सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण होगी।
डब्ल्यूएएसएच के लिए 16वें वित्त आयोग के अनुदान पर डीडीडब्ल्यूएस की प्रस्तुति
वाई.के. सिंह, निदेशक (एनजेजेएम), ने ग्रामीण जल आपूर्ति और स्वच्छता सेवाओं की स्थिरता को मजबूत करने में 16वें वित्त आयोग अनुदानों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रस्तुति दी। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में निर्मित संपत्तियों के प्रभावी संचालन एवं रखरखाव और दीर्घकालिक कार्यक्षमता सुनिश्चित करने के लिए इन अनुदानों को जेजेएम और एसबीएम-जी के साथ संरेखित करने की आवश्यकता पर बल दिया। जेजेएम के तहत हासिल की गई महत्वपूर्ण प्रगति के साथ उन्होंने बुनियादी ढांचे के निर्माण से सतत सेवा वितरण पर ध्यान केंद्रित करने की ओर बदलाव को रेखांकित किया और ग्राम पंचायतों की गांव-स्तरीय जल आपूर्ति प्रणालियों, जल गुणवत्ता और स्वच्छता बुनियादी ढांचे के प्रबंधन में केंद्रीय भूमिका पर बल दिया।
प्रस्तुति में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि वित्त आयोग अनुदान उपयोगकर्ता शुल्क संग्रह के साथ मिलकर ग्राम पंचायत स्तर पर संचालन एवं रखरखाव के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं। 16 वें वित्त आयोग के तहत आवंटित कुल 4.35 लाख करोड़ रुपये से अधिक राशि में से 50 प्रतिशत मूल अनुदान जल और स्वच्छता से संबंधित है, जो लगभग 1.74 लाख करोड़ रुपये है। इन निधियों का उपयोग विभिन्न प्रकार की गतिविधियों के लिए किया जा सकता है, जिनमें जल स्रोतों को सुदृढ़ करना, क्लोरीनीकरण, जल प्रणालियों की मरम्मत और रखरखाव, जल गुणवत्ता निगरानी, परीक्षण किटों की खरीद, संचालकों को भुगतान और ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति शामिल है। ये अनुदान स्वच्छता संबंधी गतिविधियों जैसे सामुदायिक स्वच्छता सुविधाओं का रखरखाव, अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली, ग्रेवाटर प्रबंधन और शौचालयों तथा संबंधित बुनियादी ढांचे के निर्माण में भी सहायता प्रदान करते हैं।
उन्होंने ग्राम पंचायत विकास योजनाओं (जीपीडीपी) के माध्यम से इन अनुदानों के प्रभावी नियोजन और उपयोग के महत्व पर जोर दिया, जो ग्राम सभाओं द्वारा अनुमोदित होते हैं और जिनकी निगरानी ई-ग्राम स्वराज और पीएफएमएस के माध्यम से की जाती है। जल गुणवत्ता निगरानी में सुधार, अपशिष्ट जल प्रबंधन को बढ़ावा देने और ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को मजबूत करने पर भी बल दिया गया। राज्यों और स्थानीय निकायों को सलाह दी गई कि वे निधियों का समय पर उपयोग सुनिश्चित करें, लेखापरीक्षा और रिपोर्टिंग आवश्यकताओं का पालन करें तथा निधि जारी करने में देरी से बचने और उपलब्ध संसाधनों के अधिकतम उपयोग के लिए उचित योजना बनाएं।
प्रस्तुतियों के माध्यम से जिलों द्वारा साझा की गई नवोन्मेषी सर्वोत्तम प्रथाएं
पेयजल संवाद के दौरान कुल पाँच जिलों ने अपनी प्रगति और सर्वोत्तम जमीनी प्रथाओं को प्रस्तुत किया, जिससे अन्य राज्यों के जिलों को जेजेएम 2.0 के तहत बेहतर विकास करने में मदद मिलेगी। प्रत्येक प्रस्तुति संबंधित जिला कलेक्टर/जिला मजिस्ट्रेट/उपायुक्त/जिला अधिकारियों द्वारा दी गई।
- ऊना, हिमाचल प्रदेश – उपायुक्त जतिन लाल ने जिले की प्रगति, उपलब्धियों और पहलों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ऊना में बिखरी हुई बस्तियाँ, पंपिंग योजनाओं पर निर्भरता, वोल्टेज में उतार-चढ़ाव, बिजली कटौती और विभिन्न विभागों से अनुमतियाँ प्राप्त करने जैसी समस्याएँ हैं। जिले को बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं से भी जूझना पड़ा है, जिसके लिए फील्ड टीमों और आपदा राहत स्वयंसेवकों को तैनात किया गया है, ताकि व्यवधान को कम किया जा सके और पाइपलाइनों में हुए नुकसान का आकलन किया जा सके।
उपायुक्त ने बताया कि जिले ने मानसून के दौरान भूजल पुनर्भरण और दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए जल स्रोतों के रखरखाव, जिला तकनीकी इकाइयों को सुदृढ़ करने, ग्राम स्तरीय समितियों को सक्रिय करने, डिजिटल गवर्नेंस को बढ़ावा देने, डिजिटल रजिस्ट्री और संपत्तियों एवं योजनाओं की जीआईएस/जीपीएस आधारित निगरानी के लिए कदम उठाए हैं। इन पहलों से जिले को कार्यान्वयन संबंधी मुद्दों की निगरानी, पारदर्शिता और समय पर समाधान में सुधार करने में मदद मिली है।
जिले ने भूमि संबंधी मामलों, अनुमतियों, बुनियादी ढांचे के संरक्षण और जल आपूर्ति योजनाओं के सुचारू कार्यान्वयन के लिए संबंधित विभागों और स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय स्थापित करने के प्रयासों को भी साझा किया। राजस्व, पुलिस और अन्य प्रशासनिक एजेंसियों जैसे विभागों के साथ नियमित समन्वय से जमीनी स्तर की चुनौतियों का तेजी से समाधान करने में सहायता मिली है।
- अयोध्या, उत्तर प्रदेश – जिला मजिस्ट्रेट शशांक त्रिपाठी ने बताया कि डीडब्ल्यूएसएम के माध्यम से नियमित निगरानी की जा रही है। शादबाशपुर में एक आदर्श योजना का प्रदर्शन किया गया, जहां 24×7 जल आपूर्ति सुनिश्चित की गई है और लगभग 700 घरों में कनेक्शन लगाए गए हैं। इस योजना की एक उल्लेखनीय विशेषता जल आपूर्ति प्रणाली के प्रबंधन में एक महिला संचालक की सक्रिय भागीदारी है। कुल मिलाकर, जिले भर में 17 महिला संचालक वर्तमान में विभिन्न योजनाओं का प्रबंधन कर रही हैं, जिसकी अन्य क्षेत्रों में भी अनुकरण करने की क्षमता के कारण व्यापक रूप से सराहना की जा रही है।
परियोजना के कार्यान्वयन के दौरान स्थानीय समुदायों के लिए एक प्रमुख चिंता का विषय रही सड़क मरम्मत पर विशेष जोर दिया गया है। जिला प्रशासन ने ग्रामीणों को होने वाली असुविधा को कम करने के लिए सड़क मरम्मत को समग्र कार्यान्वयन योजना में एकीकृत किया है।
प्रस्तुति में जल स्रोतों की स्थिरता और जल सुरक्षा की दिशा में किए जा रहे प्रयासों पर भी प्रकाश डाला गया। ग्राम पंचायतों, ब्लॉकों और व्यक्तिगत हितधारकों के माध्यम से ग्राम स्तर पर पुनर्भरण संरचनाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है, साथ ही भूजल पुनर्भरण को मजबूत करने के लिए योजना स्थलों पर वर्षा जल संचयन प्रणालियों को भी स्थापित किया जा रहा है।
इस कार्यक्रम में महिलाओं की भागीदारी एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनी हुई है। महिला संचालक, प्लंबर और स्वयं सहायता समूह की सदस्य संचालन, जल गुणवत्ता परीक्षण, सामुदायिक सहभागिता और उपयोगकर्ता शुल्क संग्रह में सक्रिय रूप से शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी द्वारा किए गए एक अध्ययन महिलाओं के स्वास्थ्य पर इस मिशन के प्रभाव का आकलन कर रहा है। मुजफ्फरपुर-जलालपुर योजना स्थल पर सीएसआर समर्थित प्रशिक्षण केंद्र के माध्यम से कौशल विकास को भी मजबूत किया गया है।
- यमुना नगर, हरियाणा – उपायुक्त सुश्री प्रीति ने बताया कि चल रहे सुधारों के तहत जिले ने जल आपूर्ति योजनाओं के हस्तांतरण और प्रबंधन के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग और ग्राम पंचायतों के बीच 60 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं। जिला प्रशासन ने आगे बताया कि हस्तांतरण से संबंधित शेष तकनीकी प्रक्रियाओं पर काम चल रहा है और यह प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है।
जिले के दृष्टिकोण का एक प्रमुख केंद्र बिंदु सूचना, शिक्षा एवं संचार (आईईसी) गतिविधियाँ रही हैं। जल अपव्यय को कम करने, जल के जिम्मेदार उपयोग को प्रोत्साहित करने और सेवा शुल्क संग्रह को बढ़ावा देने के लिए गांवों, विद्यालयों और सामुदायिक समूहों में जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। उन्होंने जल गुणवत्ता निगरानी और सामुदायिक सहभागिता में स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया। एसएचजी सदस्यों को जल परीक्षण प्रोटोकॉल, शिकायत निवारण और गुणवत्ता आश्वासन में प्रशिक्षित और मार्गदर्शन दिया गया है।
जिले ने पर्यावरण स्थिरता की दिशा में किए जा रहे प्रयासों पर भी प्रकाश डाला। स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के सहयोग से लगभग 1,000 पेड़ लगाए गए हैं और सदस्य अगले एक वर्ष तक उनकी वृद्धि की निगरानी करेंगे। जिला, उप-मंडल और विभागीय स्तर पर नियमित निगरानी की जाती है, जबकि 24×7 हेल्पलाइन शिकायतों के त्वरित निवारण को सुनिश्चित करती है।
- असम के शिवसागर जिले में उपायुक्त मृदुल यादव ने जल जीवन मिशन के अंतर्गत हुई प्रगति को प्रस्तुत करते हुए ग्रामीण जल आपूर्ति योजनाओं के सामुदायिक नेतृत्व में संचालन एवं रखरखाव, शुल्क संग्रह और दीर्घकालिक स्थिरता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पंचायतों, जल उपयोगकर्ता समितियों (डब्ल्यूयूसी), स्वयं सहायता समूहों और सक्रिय सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से जिले ने लगभग 76प्रतिशत शुल्क संग्रह हासिल किया। नियमित रूप से डीडब्ल्यूएसएम बैठकें, क्षेत्र निरीक्षण और अंतर-विभागीय समीक्षाएं आयोजित की जाती हैं, जबकि पीएचईडी और पंचायत अधिकारी संयुक्त रूप से योजनाओं का निरीक्षण सौंपने से पहले करते हैं।
प्रस्तुति में पंप संचालन सुनिश्चित करने में पीआरआई के प्रतिनिधियों, डब्ल्यूयूसी और जल मित्रों की भूमिका पर जोर दिया गया। आईटीआई के माध्यम से प्रशिक्षित जल मित्र न केवल पंप संचालन में सहायता करते हैं, बल्कि छोटे-मोटे मरम्मत कार्य, रखरखाव और शुल्क संग्रह में भी सहयोग करते हैं, जिससे ठेकेदारों पर निर्भरता कम होती है।
एक प्रमुख उपलब्धि “नारी शक्ति से जल शक्ति” पहल थी, जिसमें जल आपूर्ति प्रणालियों के प्रबंधन में महिलाओं के नेतृत्व को प्रदर्शित किया गया। महिलाएं वित्तीय प्रबंधन, शुल्क संग्रह और सेवा वितरण की निगरानी में सक्रिय रूप से शामिल हैं, जिससे जवाबदेही और सामुदायिक स्वामित्व को मजबूती मिलती है।
डिजिटल नवाचार भी उल्लेखनीय रहा, जिसमें क्यूआर कोड आधारित शुल्क भुगतान से पारदर्शिता और संग्रह में आसानी हुई। हाटी मुरिया-घाटगलिया योजना ने मजबूत सामुदायिक प्रबंधन के माध्यम से 350 घरों से 100 प्रतिशत शुल्क संग्रह हासिल किया। नागालैंड सीमा के निकट चुनौतीपूर्ण इलाकों में भी व्यवहार में बदलाव ने समुदायों को उपयोगकर्ता शुल्क में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया है, जिससे स्थिरता सुनिश्चित हुई है।
- सेफाईजाला, त्रिपुरा – जिला मजिस्ट्रेट और कलेक्टर डॉ. सिद्धार्थ शिव जायसवाल ने न्यायिक एवं जल प्रबंधन (जेजेएम) के अंतर्गत जिले की प्रगति प्रस्तुत करते हुए ग्रामीण पेयजल कवरेज और सतत विकास संबंधी पहलों में हासिल की गई महत्वपूर्ण उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। जिले के 108 गांवों में 86.46 प्रतिशत नल कनेक्शन पहुंचाए जा चुके हैं, जो मिशन के शुभारंभ से पहले मात्र 3 प्रतिशत कवरेज की तुलना में एक उल्लेखनीय सुधार है। शेष घरों को भी चल रही योजनाओं के चालू होने पर कवर किए जाने की उम्मीद है।
उपायुक्त ने बताया कि नियमित रूप से हर महीने डीडब्ल्यूएसएम बैठकें आयोजित की जा रही हैं, साथ ही तकनीकी निरीक्षण, तृतीय-पक्ष लेखापरीक्षा और समय पर सुधारात्मक कार्रवाई भी की जा रही है। राज्य के सार्वजनिक शिकायत पोर्टल के माध्यम से एक मजबूत शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया गया है, जिससे पेयजल संबंधी मुद्दों का शीघ्र समाधान संभव हो पा रहा है।
जल स्रोतों की स्थिरता को मजबूत करने के लिए जिले में 300 भूजल पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण किया जा रहा है, जिनमें से 82 पूरी हो चुकी हैं। इन प्रयासों के चलते जिले को प्रतिष्ठित राष्ट्रीय जल पुरस्कार प्राप्त हुआ है। जल संरक्षण और स्थिरता उपायों के लिए वीबी-जी आरएएम जी जैसी योजनाओं के साथ समन्वय का भी लाभ उठाया जा रहा है।
जल सेवा आकलन और जल अर्पण दिवस ने जल आपूर्ति प्रणालियों में सामुदायिक भागीदारी और स्वामित्व को बढ़ाने में मदद की है। स्कूलों में जागरूकता अभियान, ग्राम अभियान और एफटीके का उपयोग करके जल गुणवत्ता परीक्षण में 650 महिलाओं को प्रशिक्षण सहित व्यापक सूचना, शिक्षा एवं संचार (आईईसी) गतिविधियां चलाई जा रही हैं, ताकि सभी के लिए दीर्घकालिक स्थिरता और सुरक्षित पेयजल सुनिश्चित किया जा सके।
इन प्रस्तुतियों में जेजेएम के तहत हासिल की गई उपलब्धियों, मौजूदा चुनौतियों और सर्वोत्तम प्रथाओं को प्रदर्शित किया गया, जिसमें ‘हर घर जल’ के तहत प्रगति को गति देने के लिए अपनाए गए दृष्टिकोणों की विविधता को रेखांकित किया गया।
अपने समापन भाषण में श्री कमल किशोर सोआन, अपर सचिव और मिशन निदेशक, एनजेजेएम ने जिलों द्वारा साझा किए गए अभिनव दृष्टिकोणों की सराहना की और इस बात पर जोर दिया कि जेजेएम 2.0 की सफलता जिला कलेक्टरों के सक्रिय नेतृत्व पर निर्भर करती है।
जिला कलेक्टरों के पेयजल संवाद के इस 9वें संस्करण में देश भर से प्रतिभागियों ने भाग लिया, जिनमें राज्य/केंद्र शासित प्रदेशों के जिला कलेक्टर/उपायुक्त/जिला अधिकारी, मिशन निदेशक और राज्य मिशन दल शामिल थे।