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July 8, 2026

शोधित अपशिष्ट जल एक संसाधन : एनएमसीजी

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने कहा है कि शोधित अपशिष्ट जल के सुरक्षित पुन: उपयोग के राष्ट्रीय ढांचे के तहत इसका औद्योगिक और गैर-पेय कार्यों में तेजी से इस्तेमाल किया जा रहा है और इस तरह मलजल को केवल निपटान की समस्या के बजाय एक ”संसाधन” के रूप में स्थापित किया जा रहा है। मिशन ने एक ‘पोस्ट’ साझा कर उन मौजूदा परियोजनाओं का उल्लेख किया जहां औद्योगिक कार्यों में मीठे पानी की जगह शोधित मलजल का इस्तेमाल किया जा रहा है। मिशन ने ‘नमामि गंगे’ के ‘एक्स’ खाते पर पोस्ट साझा करते हुए कहा, ”हम मलजल को अब तक गलत तरीके से देखते रहे हैं। शोधित अपशिष्ट जल को दशकों से एक ऐसी चीज माना जाता रहा है जिससे छुटकारा पाना है। इसे एक उप-उत्पाद और निपटान की समस्या समझा जाता रहा है।” पोस्ट में कहा गया, ”एनएमसीजी ने इस सोच को बदला। शोधित जल के सुरक्षित पुन: उपयोग के राष्ट्रीय ढांचे के तहत शोधित मलजल अब एक संसाधन है और यह उन जगहों पर मीठे पानी की जगह ले रहा है, जहां मीठे पानी की बर्बादी कभी नहीं होनी चाहिए।” जल शक्ति मंत्रालय के तहत आने वाले मिशन के अनुसार, ‘ट्रांस यमुना’ मलजल शोधन संयंत्र (एसटीपी) से प्रतिदिन 80 लाख लीटर शोधित जल औद्योगिक उपयोग के लिए मथुरा रिफाइनरी को भेजा जा रहा है। मिशन ने दिल्ली में प्रगति पावर कॉरपोरेशन और झारखंड में जोजोबेरा ताप विद्युत संयंत्र द्वारा भी शोधित अपशिष्ट जल के पुन: उपयोग का उल्लेख किया। ये संयंत्र नजदीकी मलजल शोधन संयंत्रों से लिए गए पानी का तापीय और संचालनात्मक कार्यों में इस्तेमाल कर रहे हैं। एनएमसीजी ने कहा कि यह ढांचा औद्योगिक, कृषि और अन्य गैर-पेय क्षेत्रों में शोधित अपशिष्ट जल के इस्तेमाल को बढ़ावा देता है ताकि नदियों और भूजल स्रोतों से मीठे पानी की निकासी कम की जा सके। पोस्ट में कहा गया, ”किसी बिजली संयंत्र को टर्बाइन ठंडा करने के लिए पेयजल की जरूरत नहीं होती। किसी निर्माण स्थल को कंक्रीट मिलाने के लिए इसकी जरूरत नहीं होती। किसी खेत को सिंचाई के लिए इसकी जरूरत नहीं होती। इन सभी कामों के लिए शोधित अपशिष्ट जल पूरी तरह उपयुक्त है।” मिशन ने कहा कि इस ढांचे को कई नीतिगत और क्रियान्वयन तंत्रों का समर्थन प्राप्त है। मिशन ने इस पहल को ”चक्रीय जल भविष्य” का हिस्सा बताया, जिसमें मलजल शोधन संयंत्रों में एकत्र और शोधित किए गए अपशिष्ट जल को शोधित जल में बदलकर औद्योगिक तथा अन्य गैर-पेय कार्यों में फिर इस्तेमाल किया जाता है। एनएमसीजी ने कहा कि यह प्रक्रिया अंतत: नदियों और जलभृतों की रक्षा करने में मदद करती है क्योंकि इससे पानी की निकासी कम होती है, पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार होता है और दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित होती है। मिशन ने कहा, ”हर लीटर शोधित जल का पुन: उपयोग, पहले से दबाव झेल रहे मीठे पानी के स्रोतों से एक लीटर कम पानी निकालने के बराबर है।” पोस्ट में कहा गया, ”अपशिष्ट जल अंत नहीं है बल्कि यह अगले चरण की शुरुआत है।”

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